जैसी भी ज़िन्दगी है

जैसी भी ज़िन्दगी है 

नज़र तो आ रही है।

दर्द ज्यादा मिले तो क्या

कुछ खुशी भी आ रही है।

कभी ठहरी हुई दौड़े ये 

कभी चलती हुई ठहरी है,

कभी पालने में बच्चे सा

मुझको खिला रही है।

Poet Reetesh

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