प्रकृति और पुरुष
मैं जब इक बार
तप गया था।
देखा हवा चली
बारिश आयी।
अंधेरों ने कभी
घेर लिया जो।
सूरज निकला
रोशनी आयी।।
प्यास से बेचैन
भटक रहा था।
अमृत की घटा ने
प्यास बुझाई।।
मुझे सजाने
निखारने को।
कुम्हार जैसे सदा
प्रकृति पास आयी।।
...Poet Reetesh (9July 2013 mnit)
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