तमाशा मत बनाओ जिन्दगी को

नज़र ठोकर पे ठोकर खा रही है
उजाले हैं मगर काले बहुत हैं।

तमाशा मत बनाओ जिन्दगी को
तमाशा देखने वाले बहुत हैं।।

पत्थर भी फूलों से लगते थे हमें
कब, किसने, कितने बरसाए याद नहीं।

शिकवा गिला करना बेमानी लगता है
हमने कितने दर्द छुपाए याद नहीं।।

मेरे घर जो भी आता है
वो बरकत साथ लाता है
परिंदे छत पे आते हैं
तो दाना कम नहीं होता। 

मुहब्बत ऐसी दौलत है
जो दिन रात बढ़ती है
लुटाए जाइए लेकिन 
खजाना कम नहीं होता।।

Gulzar Sahab


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