पाली जाती हैं उलझनें
अंधेरी है रात
बाहर बरसात
भीतर उलझन
बेचैन जज़्बात।
खुद की पाली उलझनें
खुद के पाले जज़्बात,
हमको जो खूब मन है
चलने का दुनिया के साथ।
अनोखे जिन्दगी के खेल हैं
पहले खुद आती हैं उलझनें,
फिर जानने के बाद
पाली जाती हैं उलझनें।
Poet Reetesh
(26aug 2012 mnit jaipur)
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