मेरे कंठ तुम्हारी श्रुति हो
मेरे दांव
तुम्हारी मति हो
फिर चाहे जय हो
या छति हो।
तुम्हारी गति हो,
फिर चाहे जो भी
परिणति हो।।
मेरे कंठ
तुम्हारी श्रुति हो,
ये मेरी अंतिम
प्रतिश्रुती हो।
मेरे प्राण
तुम्हारी रति हो,
फिर कैसी भी
सुरती निरति हो।।
... तारा प्रकाश
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