न हो जब दिल ही सीने में

बकद्र ए शौक नहीं
जरफे तंगनाए* गजल।

कुछ और चाहिए बुसअत*
मेरे बयां के लिए।।
(तंग गली, विशालता)

न सताइश की तमन्ना
न सिले की परवाह।

  
गर नहीं हैं मेरे 
अशआर* में माने ना सही।। 
(शब्द)

ऐसा आसा नहीं लहू रोना,
दिल में ताकत जिगर में हाल कहां

फिक्रे दुनिया में सिर खपाता हूं,
मैं कहां और ये बवाल कहां।

करे है कत्ल लगावत में तेरा रो देना,
तेरी तरह कोई तेगे* निगाह को आब* तो दे।
(तीरे नज़र, ठंडक)

बेहरा हूं मैं तो चाहिए
दूना हो इलतफात*,
सुनता नहीं हूं बात 
मुकर्रर* कहें बगैर।
(दया, again)

ग़ालिब

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