प्यास HRB

प्यास जब तीव्रतम थी
बन गया था संयमी मैं

है रही मेरी क्षुधा ही
सर्वदा आहार मेरा।

प्यास वारिधि से बुझाकर
भी रहा अतृप्त हूं मैं,

कामिनी के कुच कलश से
आज क्या अभिसार मेरा।

मै नहीं हूं देह धर्मो से
बधा जग जान ले तू,

तन विकृत हो जाए लेकिन
मन सदा अविकार मेरा।

वे सुमन के बाण
मैंने ही दिए थे पंचशर को,

जीत पाएगा इन्हीं से
आज क्या मन मार मेरा।

कह रहा जग वासनामय

हो रहा उद्धार मेरा।।

HR Bachchan ji

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