ये भी तो स्वच्छ भारत है
कब से बिखेर रहे थे,
तुम कूड़ा चारों ओर,
मैंने देखा समेटा उसे,
तो तुम भड़क उठे।
मुझे चोर बताने लगे,
कूड़े पे हक जताने लगे।
मैं सोच में पड़ गया,
जो बेकार पड़ा था कबसे,
इसमें ऐसा क्या था,
ये भी तो स्वच्छ भारत है।
ये सहेजना विध्वंस दिखता है?,
क्या अब कूड़े से बीमारी नहीं फैलती,
ये कूड़े से प्रेम है या अच्छाई से जलन,
क्या सफाई भी पूछकर करनी चाहिए?
तुम रोक दो कूड़ा बिखेरना,
मैं बन्द कर दूंगा यूं कूड़ा समेटना।
...poet Reetesh
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