कोशिश करो जीने की
मेरे साथ
खण्डहर में दबी हुई अन्य धुकधुकियों,
सोचो तो
कि स्पन्द अब,
पीड़ा-भरा उत्तरदायित्व-भार हो चला,
कोशिश करो,
जीने की,
ज़मीन में गड़कर भी।
इतने भीम जड़ीभूत
टीलों के नीचे हम दबे हैं,
फिर भी जी रहे हैं।
सृष्टि का चमत्कार!!
चमत्कार प्रकृति का ज़रा और फैलाए।
सभी कुछ ठोस नहीं खंडेरों में।
हज़ारों छेद, करोड़ों रन्ध्र,
पवन भी आता है।
ऐसा क्यों?
ऑक्सीजन
नाक से
पी लें ख़ूब, पी लें!
आवाज़ आती है,
सातवें आसमान में कहीं दूर
इन्द्र के ढह पड़े महल के खण्डहर को
बिजली कि गेतियाँ व फावड़े
खोद-खोद
ढेर दूर कर रहे।
कहीं से फिर एक
आती आवाज़-
'कई ढेर बिलकुल साफ़ हो चुके'
और तभी-
किसी अन्य गम्भीर-उदात्त
आवाज़ ने
चिल्लाकर घोषित किया-
'प्राथमिक शाला के
बच्चों के लिए एक
खुला-खुला, धूप-भरा साफ़-साफ़
खेल कूद-मैदान सपाट अपार-
यों बनाया जाएगा कि
पता भी न चलेगा कि
कभी महल था यहाँ भगवान् इन्द्र का।'
हम यहाँ ज़मीन के नीचे दबे हुए हैं।
गड़ी हुई अन्य धुकधुकियों,
खुश रहो
इसी में कि
वक्षों में तुम्हारे अब
बच्चे ये खेलेंगे।
छाती की मटमैली ज़मीनी सतहों पर
मैदान, धूप व खुली-खुली हवा ख़ूब
हँसेगी व खेलेगी।
किलकारी भरेंगे ये बालगण।
लेकिन, दबी धुकधुकियों,
सोचो तो कि
अपनी ही आँखों के सामने
ख़ूब हम खेत रहे!
ख़ूब काम आए हम!!
आँखों के भीतर की आँखों में डूब-डूब
फैल गए हम लोग!!
आत्म-विस्तार यह
बेकार नहीं जाएगा।
ज़मीन में गड़े हुए देहों की ख़ाक से
शरीर की मिट्टी से, धूल से।
खिलेंगे गुलाबी फूल।
सही है कि हम पहचाने नहीं जाएँगे।
दुनिया में नाम कमाने के लिए
कभी कोई फूल नहीं खिलता है
ह्रदयानुभव-राग अरुण
गुलाबी फूल, प्रकृति के गन्ध-कोष
काश, हम बन सकें!
~Muktibodh
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