आलिंगन विरह-मिलन का

मैं नहीं चाहता चिर-सुख,
 

मैं नहीं चाहता चिर दुख;


सुख-दुख की खेल मिचौनी
 

खोले जीवन अपना मुख।



सुख-दुख के मधुर मिलन से
 

यह जीवन हो परिपूरण;


फिर घन में ओझल हो शशि,
 

फिर शशि से ओझल हो घन।



जग पीड़ित है अति-दुख से,
 

जग पीड़ित रे अति-सुख से,


मानव-जग में बँट जावें
 

दुख सुख से औ सुख दुख से।
 

अविरत दुख है उत्पीड़न,
 

अविरत सुख भी उत्पीड़न,


दुख-सुख की निशा-दिवा में,
 

सोता-जगता जग-जीवन।

 

यह साँझ-उषा का आँगन,
 

आलिंगन विरह-मिलन का;


चिर हास-अश्रुमय आनन
 

रे इस मानव-जीवन का!!


...Sumitranandan PANT

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