लौट कर आना
इन परिन्दों का नहीं है
ज़ोर कुछ तूफानो पर!
लौट कर आना है इनको
फिर इसी जलयान पर!
ज़िन्दगी चिथड़ो में लिपटी
भूख को बहला रही
और हम फिर भी फिदा हैं
अधमरे इमान पर!!
हरिया, ज़ुम्मन और ज़ोसफ़
सबके सब बेकार हैं!
फख़्र हम कैसे करें फिर
आज के विग्यान पर!
ज़िन्दगी यूँ तो गणित है पर
गणित-सा कुछ भी नहीं
चल रही है इसकी गाड़ी
अब महज़ अनुमान पर
जिसको इज़्ज़त कह रहे हो दर हक़ीक़त कुछ नहीं
हर नज़र है आपके बस कीमती सामान पर
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झूठ की है कोठियाँ ही कोठियाँ
एक कमरा तक नहीं सच का यहाँ
और कितने दिन रुलाएँगी बता
आदमी की ज़ात को ये रोटियाँ
कौन कितना आसमाँ देखेगा अब
फ़ैसला इसका करेंगी खिड़कियाँ
बन्दरों ने बाँट ली दौलत सभी
देखती रह गई सब बिल्लियाँ
कुम मिलाकर ये मिला इस दौर में
भय, थकन, कुंठा, निराशा, सिसकियाँ
Ashwaghosh

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