बड़ा साड़ा समझता है

बड़ा साड़ा समझता है,

मेरी गुलामी नहीं करता।

मैं ही दुनिया चलाता हूं,

तुझे कुछ डर नहीं लगता है।।

अच्छे अच्छों को तोड़ा हूं,

तू किस खेत की मूली है।

तुझे कुछ होश है कि नहीं,

सच को सच कहता है।।

वफा को जफा लिख,

दिन को रात बोला कर।

नेट ब्लॉक कर देता हूं

मेरे खिलाफ जो बकता है।।

सेवा के नशे में चूर,

मुझे है श्रम का अहंकार।

मैं दर्द बांट कर झूमता हूं,

तू मुझी पे हंसता है।।

हर ओर मेरे चेले हैं,

हर ओर मेरा धंधा है।

ये सत्ता खुद मैंने कमाई है,

बेकार उसूलों की बात करता है।।

...poet Reetesh 
(vyangya)😈



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