यशोधरा
कभी तुम दूर थी,
कभी मैं दूर हुआ।
बात बड़ी नहीं है,
जो हाल ऐसा हुआ।
कभी मिले भी हम तो,
जुदाई सा लगा।
तेरे हाथों को पकड़,
मैं और टूटा, बिखरा।।
न होश बचा, न दिल
ऐसा तेज़ सफर हुआ।
कई जंजालों से निकल
कहीं तुझमें खो गया।।
तुमसे दूर हो के फिर
खुद को खोजने चला।
बड़ी जोर हंसा
जब खुद से मिला।
तुम रुके थे कबसे,
मैं पहली बार रुका।।
जब रुका मैं,
तो चलना सीखा।
जब चलने लगा,
तो कोई मंजिल नहीं रहा।।
तुम अभी भी रुकी रही,
उन मंजिलों के पास।
रेत पे महल बनाती रही,
वक़्त चलता रहा।।
...poet Reetesh 😊
Comments
Post a Comment