धूल धूल

नया काम चल रहा है,

हर तरफ धूल ही धूल है।

गमछे पर,
चादर पर,
चेहरे पर 
ये धूल अब कहां पोछूं।

सब डरे हुए हैं सामान,

मुझे कुछ साफ़ देखकर।

उनकी धूल से कहीं

मैं और गंदा न हो जाऊं।

मैं भी सोच में पड़ गया हूं,

चमकती धूल का भार लिए।

मैं दूर दूर ही रहूं,

या फिर खेलूं। 

डुबके इससे मैं भी 

धूल धूल हो जाऊं।

...poet Reetesh 😊

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