खेल दुनियादारी का
यूं ही भूल जाने की
अपनी आदत नहीं तमाम
देखें किस हद से होता है
अगर ऐसा जो होता है।।
भुला दूं वक़्त की बंदिशें
अपने होने न होने का,
कहां तक वो पहुंचता है
जो कभी लहरों में खोता है।
दिखाए आखरी रस्ता
कोई हो आखरी मंजिल,
कहां नजारों के पीछे
नजारा खत्म होता है।
खेल दुनियादारी का
हौसले दुनिया से परे,
कैसा किस हद से होता है
कभी ऐसा जो होता है।
Poet Reetesh
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