देखा मेरे देवता ने

पहना गहरा बसंती जोड़ा,

और इत्रे-सुहाग में बसाया !

आइने में ख़ुद को फिर कई बार,

उसकी नज़रों से मैंने देखा !



संदल से चमक रहा था माथा,

चंदन से बदन दमक रहा था !

होंठों पर बहुत सारी लाली,

गालों पे गुलाल खेलता था


और सारे बदन से फूटता था,

उसके लिए गीत जो लिखा था

हाथों में लिए दिये की थाली,

उसके क़दमों में जाके बैठी



आई थी कि आरती उतारूं,

सारे जीवन को दान कर दूं

देखा मेरे देवता ने मुझको,

बाद इसके ज़रा-सा मुस्कराया



फिर मेरे सुनहरे थाल पर हाथ,

रखा भी तो इक दिया उठाया

और मेरी तमाम ज़िन्दगी से,

मांगी भी तो इक शाम मांगी !!!


parvin shakir

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